सात नियम

जीवन की पवित्रता

तीसरा नियम: हत्या न करें। तोराह हर मनुष्य को एक सम्पूर्ण संसार क्यों कहती है — और यह बात हममें से हरेक से क्या माँगती है।


जलप्रलय के बाद परमेश्वर ने नोआह के साथ अपनी वाचा नई की और उसका नैतिक केंद्र एक ही वचन में दे दिया: “जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा, मनुष्य के द्वारा उसका लहू बहाया जाएगा — क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया है” (उत्पत्ति 9:6)।

कारण को एक बार फिर पढ़िए: क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया है। हत्या का निषेध केवल समाज को चलाए रखने का कोई नियम नहीं है। यह इस बात की घोषणा है कि मनुष्य है क्या। हर व्यक्ति — चाहे वह किसी भी राष्ट्र, जाति, धर्म या स्थिति का हो — अपने भीतर अनंत की एक चिनगारी लिए चलता है। किसी मानव जीवन का नाश करना संसार में से ईश्वरीय छवि को नोच डालना है।

एक व्यक्ति एक सम्पूर्ण संसार है

मिश्ना — मौखिक तोराह का आधारभूत ग्रंथ — इसका निष्कर्ष ऐसे शब्दों में निकालती है जो सारे संसार में फैल चुके हैं:

“जिसने एक भी प्राण का नाश किया, मानो उसने एक सम्पूर्ण संसार का नाश कर दिया; और जिसने एक भी प्राण को बचाया, मानो उसने एक सम्पूर्ण संसार को बचा लिया।” (मिश्ना सैन्हेड्रिन 4:5)

“एक सम्पूर्ण संसार” क्यों? क्योंकि सारी मानवजाति एक ही मनुष्य — आदम — से आरंभ हुई। परमेश्वर चाहता तो एक साथ भीड़ रच सकता था; उसने एक ही को रचा — ताकि सदा के लिए यह सिखा दे कि एक ही पर्याप्त है, कि एक ही सब कुछ है। कोई किसी की प्रतिलिपि नहीं; कोई भी ऐसा नहीं जिसे खोया जा सके।

इस नियम में क्या-क्या समाया है

“नोआह की संतान” (बनेई नोअख़ — तोराह द्वारा समस्त मानवजाति को दिए गए सात नियमों की वाचा को अपनाने वाले लोग) के मार्ग में जीवन की पवित्रता का यह नियम स्पष्ट अर्थ से कहीं व्यापक है:

  • हत्या नहीं — इसमें असाध्य रोगियों और मरणासन्न व्यक्तियों की हत्या भी सम्मिलित है; मानव जीवन का एक-एक क्षण अनंत मूल्य रखता है, और न किसी का दूसरे के जीवन पर स्वामित्व है, न स्वयं अपने जीवन पर।
  • गर्भस्थ जीवन की रक्षा — नोआह की वाचा अपनी रक्षा को स्पष्ट रूप से गर्भ के जीवन तक विस्तारित करती है; माता के प्राण-संकट से जुड़े प्रश्न वास्तविक हैं और उन्हें योग्य शिक्षकों के पास ले जाना चाहिए।
  • न आत्महत्या, न लापरवाह आत्म-विनाश — आपका जीवन आपको सौंपी गई धरोहर है, आपकी निजी संपत्ति नहीं।
  • बचाने का कर्तव्य — जहाँ कोई जीवन बचाया जा सकता हो, वहाँ हाथ पर हाथ धरे खड़े रहना भी अपने आप में एक अपराध है। “हत्या न करें” का दूसरा पहलू है: बचाइए

जीवन साधना का मैदान है, बाधा नहीं

यहाँ तोराह सीधे उस आध्यात्मिक प्रवृत्ति से संवाद करती है जो भारत में गहरी जड़ें रखती है: यह भावना कि देह और यह संसार एक बंदीगृह हैं, और मुक्ति का अर्थ है इन्हें पीछे छोड़ देना। तोराह की दृष्टि इसके ठीक विपरीत है — और यही बात सब कुछ बदल देती है। आत्मा इस संसार में दंड भोगने नहीं भेजी गई है। वह एक कार्य-भार लेकर भेजी गई है। देहधारी जीवन का हर दिन एक ऐसा अवसर है जो ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्गदूतों को भी प्राप्त नहीं: किसी पर दया करना, सत्य बोलना, भौतिक संसार के एक कोने को परमेश्वर का घर बना देना।

इसीलिए यह वाचा जीवन की इतनी दृढ़ता से रक्षा करती है। इसलिए नहीं कि मृत्यु अंत है — तोराह भी जानती है कि आत्मा अमर है — बल्कि इसलिए कि सृष्टि का प्रयोजन वास्तव में जीवन में ही सिद्ध होता है।

तोराह कहती है: जीवन को चुन लो (व्यवस्थाविवरण 30:19)। यही तीसरा नियम है, और यही इस पूरे मार्ग की आत्मा भी है।


स्रोत: उत्पत्ति 9:5–6; मिश्ना सैन्हेड्रिन 4:5; तलमूद सैन्हेड्रिन 57b; मैमोनिडीज़ (रमबम), राजाओं के नियम 9:4।

धर्मतोराह किसी का धर्म-परिवर्तन नहीं करता। नोआह की संतान का मार्ग समस्त मानवता की सार्वभौमिक वाचा है — इसमें धर्म या समुदाय बदलना शामिल नहीं है। व्यावहारिक प्रश्नों के लिए हम The Divine Code (रब्बी मोशे वाइनर) का अनुसरण करते हैं; कृपया किसी शिक्षक के साथ सीखिए

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